केशकाल:- बस्तर के बहुप्रतीक्षित एवं बहुचर्चित केशकाल बायपास मामले में एक बार फिर राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही सवालों के घेरे में आ गई है। कोंडागांव जिले के प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने पेड़ों की कटाई और करोड़ों के नुकसान के मामले में ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे मामले को और गरमा दिया है।
दरअसल प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन आज केशकाल क्षेत्र के दौरे पर थे। इस दौरान वे ग्राम अडेंगा में सुशासन तिहार के तहत आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में शामिल हुए। शिविर के बाद मीडिया से चर्चा के दौरान जब उनसे केशकाल बायपास में गलत अलाइनमेंट के कारण हजारों पेड़ों की कटाई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा गया, तो मंत्री ने कहा —
“अब जो भी हुआ उसके पीछे नहीं जाएंगे। क्लियरेंस मिल चुका है, टेंडर प्रक्रिया में है, जल्द ही बायपास का काम शुरू होगा। करोड़ों के नुकसान पहुंचाने वाले लोगों पर क्या कार्रवाई होगी, वन विभाग और संबंधित विभाग देखेंगे।”
मंत्री के इस बयान के बाद अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हजारों पेड़ों की कटाई और करोड़ों रुपए के नुकसान के बावजूद जिम्मेदारों पर कार्रवाई से बचने की कोशिश क्यों की जा रही है?
हैरानी की बात यह भी है कि कोंडागांव जिले के प्रभारी मंत्री को प्रशासन ने जमीनी स्थिति की सही जानकारी तक नहीं दी। मंत्री ने मीडिया के सामने कहा कि “टेंडर प्रक्रिया में है”, जबकि वास्तविकता यह है कि टेंडर प्रक्रिया काफी पहले पूरी हो चुकी है और अब तक ठेकेदार को वर्क ऑर्डर ही जारी नहीं किया गया है। यही वजह है कि बायपास निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।
जानकारी के मुताबिक वर्ष 2016-17 में केशकाल बायपास निर्माण के लिए एनएच विभाग द्वारा गलत अलाइनमेंट मैप तैयार किया गया था। इसी गलत अलाइनमेंट के आधार पर वन विभाग ने करीब 8159 पेड़ों की कटाई कर दी थी। अब रिटेंडर के बाद एक बार फिर निर्माण कार्य शुरू होने की तैयारी है, लेकिन नए प्रस्तावित अलाइनमेंट में फिर से 6000 से अधिक पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है।
यानी एक गलत योजना के कारण पहले हजारों पेड़ काटे गए और अब दोबारा हजारों पेड़ों पर आरी चलाने की तैयारी है। इससे पर्यावरण को दोहरा नुकसान होने वाला है, जबकि अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या एजेंसी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। केशकाल बायपास मामला अब सिर्फ सड़क निर्माण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही, पर्यावरणीय नुकसान और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुका है।
