नीरज उपाध्याय
रायपुर, 23 जून | बस्तर में सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ दशकों से चली आ रही लड़ाई अब लगभग खत्म हो चुकी है। राज्य सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, रोजगार और समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर प्रदान कर रही है। यह कदम शांति और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि जिन पुलिस अधिकारियों और जवानों ने वर्षों तक नक्सलवाद के खिलाफ मोर्चा संभाला, उनके भविष्य और पुनर्वास को लेकर क्या योजना है?
जी हां, बस्तर संभाग के सात जिले- बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बस्तर, कोंडागांव और कांकेर में लंबे समय तक नक्सल प्रभावित रहे हैं। इन जिलों में वर्ष 2013 बैच के कई उप निरीक्षक और पदोन्नति के बाद निरीक्षक बने अधिकारी पिछले 8 से 10 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। नक्सल मोर्चे पर डटे इन अधिकारियों ने अपनी युवा उम्र का बड़ा हिस्सा जंगलों और संवेदनशील इलाकों में बिताया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सामान्यतः कठिन क्षेत्रों में निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद मैदानी जिलों में स्थानांतरण की व्यवस्था होती है। लेकिन बस्तर में लंबे समय से सेवा दे रहे कई अधिकारियों को अब तक इसका लाभ नहीं मिला है। नतीजतन वे वर्षों से अपने परिवारों से दूर रहकर ड्यूटी करने को मजबूर हैं।
इस लंबे कार्यकाल का असर केवल अधिकारियों पर ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों पर भी पड़ा है। कई अधिकारियों के बच्चे अब उच्च शिक्षा की उम्र में पहुंच चुके हैं, लेकिन बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं से दूर हैं। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना भी उनके लिए मुश्किल हो गया है। परिवारों के लिए त्योहार, सामाजिक कार्यक्रम और जीवन के महत्वपूर्ण अवसर अक्सर बिना उनके गुजर जाते हैं।
अधिकारियों और उनके परिजनों का मानना है कि यदि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास और नई शुरुआत की व्यवस्था हो सकती है, तो वर्षों तक नक्सलवाद से लड़ने वाले पुलिसकर्मियों के लिए भी एक मानवीय और संवेदनशील स्थानांतरण नीति बनाई जानी चाहिए। उनका कहना है कि यह केवल तबादले की मांग नहीं, बल्कि लंबे समय तक किए गए त्याग, समर्पण और सेवा के सम्मान का विषय है। पुलिस अधिकारियों को उम्मीद है कि सरकार उनकी परिस्थितियों पर भी गंभीरता से विचार करेगी।
