Chhattisgarh | High Court expressed displeasure over negligence in promotion…
बिलासपुर। पदोन्नति के मामलों में विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और मनमानी पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस एके प्रसाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब किसी कर्मचारी को अस्पष्ट देरी और प्रशासनिक गलती के कारण उसके वैध पदोन्नति और वरिष्ठता अधिकारों से वंचित किया जाता है, तब न्यायालय मूक दर्शक नहीं बना रह सकता।
यह टिप्पणी सालिकराम चंद्राकर की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता स्वाति वर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने दावा किया था कि वह वर्ष 2011-12 में ही तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए पूरी तरह पात्र थे, इसके बावजूद विभाग ने करीब 10 साल तक उनकी पदोन्नति रोके रखी, जबकि उनके कनिष्ठों को पहले पदोन्नत कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए माना कि 3 मई 2012 की डीपीसी में याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए विचार नहीं करना अवैध और मनमाना था। कोर्ट ने कहा कि विभाग ने खुद 2011 की वरिष्ठता सूची में पदोन्नति कोटे को लेकर अस्पष्टता स्वीकार की थी, लेकिन उसे दूर करने के बजाय याचिकाकर्ता के अधिकारों को अनदेखा किया गया।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि “पद उपलब्ध नहीं होने” का विभागीय तर्क तथ्यात्मक रूप से गलत है, क्योंकि पदोन्नति में 50:50 कोटे का पालन नहीं किया गया और नियमों का खुला उल्लंघन हुआ। आरक्षण रोस्टर का सहारा लेकर पुराने अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता को अंततः 1 फरवरी 2019 को पदोन्नति दी गई, लेकिन तब तक वे अपने कनिष्ठों से भी नीचे चले गए। इस देरी के कारण उन्हें न केवल 10 साल की वरिष्ठता का नुकसान हुआ, बल्कि आगे की पदोन्नतियों से भी वंचित रहना पड़ा। याचिकाकर्ता 30 अगस्त 2023 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
हाई कोर्ट के अहम निर्देश
कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 7 मई 2012 से तटबंध निरीक्षक पद पर काल्पनिक पदोन्नति और वरिष्ठता दी जाएगी। हालांकि वास्तविक वेतन बकाया नहीं मिलेगा, लेकिन संशोधित वरिष्ठता के आधार पर पेंशन, वेतन निर्धारण और सभी सेवानिवृत्ति लाभों की पुनर्गणना की जाएगी।
